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तेली का मंदिर, मध्यप्रदेश -शाला सरल | Teli Ka Mandir, Madhya Pradesh – Shala Saral

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#TelikaMandir ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित है। इसकी अद्भुत बनावट में उत्तर-दक्षिण भारतीय शैली का मिश्रण देखने मिलता है। तेली का मंदिर मध्य प्रदेश में ग्वालियर शहर की ऊँची पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध ग्वालियर किले के परिसर में गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब के बिल्कुल निकट ही है।

इसका निर्माण 9वीं शताब्दी ईस्वी में प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में हुआ था। एक किंवदंती के अनुसार, इसे तेल व्यापारियों द्वारा दान किए गए धन से बनाया गया था। इसलिए, नाम तेली का मंदिर! पर्यटक इस बात की जानकारी मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखे शिलालेख से भी प्राप्त कर सकते हैं।

यह मंदिर तेली का मंदिर क्यों कहलाता है?

इस मंदिर का निर्माण गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक गुर्जर सम्राट मिहिरभोज के शासन काल में तेल के व्यापार के धन से हुआ था। तेल के व्यापक रूप से यह मंदिर तेली के मंदिर को समर्पित है।

क्या आप जानते हैं…

  • तेली का मन्दिर मध्य प्रदेश के ग्वालियर दुर्ग परिसर में स्थित प्राचीन मन्दिर है।
  • इसके आर्किटेक्चर में उत्तर और दक्षिण भारतीय शैली का मिश्रण देखने मिलता है।
  • इसकी अद्भुत बनावट ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

तेली का मंदिर | Teli ka Mandir

मंदिर को आमतौर पर विदेशी पर्यटकों द्वारा ऑयलमैन टेम्पल के रूप में जाना जाता है, जो इसके मूल नाम के अर्थ के बारे में लगातार उत्सुक रहते हैं। तेली का मंदिर में हिंदू देवता विष्णु की पूजा की जाती है। यह अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रण में है।

तेली का मंदिर की ऊंचाई लगभग 100 फीट है, यह ग्वालियर किले की सीमा के भीतर सबसे ऊंचा और सबसे सुंदर मंदिर है। यह मंदिर भगवान विष्णु को गरुड़ के रूप में समर्पित है। तेली का मंदिर की मुख्य विशेषता ‘गरुड़’ (भगवान विष्णु का पर्वत) की विशाल आकृति है।

मंदिर का निर्माण प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में, तेल के व्यापारियों द्वारा दिए गए धन से हुआ था, इसलिए इस मंदिर को तेली का मंदिर कहते हैं। ग्वालियर किले पर विद्यमान समस्त स्मारकों में यह तेली का मंदिर सबसे ऊँचा है, जिसकी ऊंचाई लगभग 30 मीटर है।

तेली मंदिर का इतिहास

मंदिर का इतिहास 8वीं और 11वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का पता लगाया जा सकता है। प्रतिहार राजा मिहिर भोज के समय में तेली का मंदिर बनवाया गया था। 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने इस मंदिर को सोडा फैक्ट्री के रूप में इस्तेमाल किया। ग्वालियर में तैनात रॉयल स्कॉट्स रेजिमेंट के अधिकारी मेजर कीथ ने 1881 और 1883 के बीच इस मंदिर की मरम्मत और पुनर्निर्माण किया।

तेली का मंदिर की वास्तुकला


मंदिर की भवन योजना में गर्भगृह तथा अंतराल प्रमुख है तथा इस में प्रवेश हेतु पूर्व की ओर सीढ़ियां है। मंदिर की प्रमुख विशेषता इसकी राज पृष्ठ आकार छत है जो कि द्रविड़ शैली में निर्मित है एवं उत्तर भारत में विरले ही देखने को मिलती है।

मंदिर की साज सज्जा विभिन्न उत्तर भारतीय मंदिरों की साज-सज्जा के समान है एवं इसकी बाहरी दीवारें विभिन्न प्रकार की मूर्ति कला से सुसज्जित है। अतः इस मंदिर में उत्तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय वास्तुकला का सम्मिश्रण देखने को मिलता है यद्यपि मंदिर से किसी अभिलेख की प्राप्ति नहीं हुई है फिर भी वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर 9वीं सदी ईसवी का प्रतीत होता है।

तेली का मंदिर हेतु दर्शन समय व शुल्क

तेली का मंदिर सुबह 08:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक खुला रहता है। मंदिर दर्शन हेतु प्रति व्यक्ति शुल्क 20 ₹ है।

कहावत | कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली

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