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भारत गुर्जरी भाषा साहित्य- कला संस्कृति का अध्ययन

Gujari language | Shalasaral

🪷🔥देव चेतना🔥🪷


अखंड भारत गुर्जरी भाषा साहित्य- कला संस्कृति का अध्ययन

मोहन लाल वर्मा

गुर्जरी भाषा साहित्य कला एवं संस्कृति की दृष्टि से अध्ययन


भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य -कला और संस्कृति का अध्ययन प्राचीन भारत के लोक साहित्य की पृष्ठभूमि में वैज्ञानिक तरीके से किए जाने की वर्तमान समय में महती आवश्यकता है। गुर्जर इतिहास भाषा साहित्य शोध संस्थान द्वारा अखंड भारतवर्ष के लोक जीवन में गुर्जरी भाषा साहित्य कला एवं संस्कृति की दृष्टि से अध्ययन प्रारंभ किया गया है। जिसकी पृष्ठभूमि साभिप्राय:भारतीय इतिहास में कतिपय शक्तियों द्वारा सोलहवीं शताब्दी से की गई विकृतियों का निराकरण एवं अखंड भारत में गुर्जर देश अथवा गुर्जरत्रा लोक संस्कृति के इतिहास का पुनर्लेखन है।


साहित्य कला एवं संस्कृति का निष्पक्ष लेखन संस्कृत, पाली, प्राकृत, गुर्जरी अपभ्रंश भाषा साहित्य के वैज्ञानिक विश्लेषणात्मक अध्ययन के बल पर ही संभव है। गुर्जरी भाषा में इतिहास की सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। प्राचीन भारत में किसी भी भाषा के विकास के पूर्व बोलचाल की लोक भाषा के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता है। साहित्यिक भाषा के साहित्य में लोक साहित्य अपनी जीवंतता के रूप में मुखरित होता है।


अखंड भारत उपमहाद्वीप का साहित्य तथा पुरा महत्व के ऐतिहासिक साक्ष्य धार्मिक साहित्य तथा इह लोक परक साहित्य के रूप में विद्यमान हैं। ब्राह्मण ग्रंथ, श्रुति- स्मृतियों के रूप में विभाजित है। इह लोक परक साहित्य, ऐतिहासिक, अर्ध ऐतिहासिक, विदेशी विवरण, जीवनियों ,युद्ध तथा कल्पना प्रधान एवं गल्प साहित्य के रूप में विद्यमान हैं।


ऐतिहासिक दृष्टि से गुर्जरत्रा लोक संस्कृति के इतिहास का क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत हैं।प्राचीन सूर्य- चंद्र- अग्नि वंशीं गुर्जर राज्य वंशों के इतिहास के अंतर्गत राजाओं तथा उनके उत्तराधिकारियों का वर्णन, शासन प्रबंध तथा अन्य राजनीतिक परिस्थितियों के अतिरिक्त आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियां भी आती है। गुर्जर राज्य वंशों का प्रारंभ सूर्य -चंद्र -अग्नि राज्य वंशों से है। जिसके प्रचुर प्रमाण महाकाव्यों एवं कल्हण की राजतरंगिणी में विद्यमान हैं। जिसमें कुषाण, शक और गुर्जर कुलो का इतिहास है। कल्हण ने कश्मीर का पूर्ण इतिहास आदिकाल से अपने काल तक का लिखा है। प्राकृत- पाली तथा गुर्जरी अपभ्रंश में अखंड भारत के साहित्य एवं संस्कृति का इतिहास विद्यमान है।अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में गुर्जरत्रा का इतिहास जिसमें उसके वीरों का गुणगान तथा उनकी स्मृतियों का पुनर्लेखन हुआ है। इनमें सोमेश्वर की राजमाला तथा कीर्ति कौमुदी, अरि सिंह के सुकृति- कीर्तन, राजशेखर के प्रबंध कोष, जय सिंह के हमीर मर्दन तथा वस्तु पाल द्वारा लिखी गई तेजपाल प्रशस्ति ,मेरूतुगं का प्रबंध चिंतामणि, उदय प्रभा की सुकृति,कल्लोलिनी तथा बालचंद्र का वसंत विलास भी ऐसे ही ग्रंथ हैं। गुर्जरत्रा संस्कृति का इतिहास इनमें मुखरित होता है। चालुक्य वंश तथा उसके पूर्वजों के इतिहास का सजीव वर्णन मिलता है।


गुर्जरत्रा के इतिहास की दृष्टि से उत्तरी भारत तथा दक्षिणापथ में छोटे-छोटे राज्य वंश जो सूर्य ,चंद्र ,अग्नि गुर्जर राजवंशों के अंग हैं। इन राज्य वंशों का काल राजनीतिक उथल-पुथल का काल रहा है। गुर्जर प्रतिहार, कन्नौज के यशोवर्मन, कामरूप का राज्य, नेपाल राज्य, कश्मीर का राज्य, कर्कोटक राजवंश, उत्पल का राज्य वंश उल्लेखनीय है। मंडोर, भीनमाल तथा कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार, गहडवाल, शाकंभरी के चौहान, बुंदेलखंड के चंदेल, मालवा के परमार, अन्हिल वाड़ा के सोलंकी, त्रिचुरी के कलचुरी, बंगाल के पाल, किसी न किसी रूप में ऐतिहासिक दृष्टि से गुर्जरत्रा लोक संस्कृति के अंग रहे हैं।


अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में बोली जाने वाली गुर्जरी भाषा के लोक साहित्य के अंतर्गत श्री देवनारायण फढ़ै लोकवार्ता का महत्वपूर्ण स्थान है। बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा में गुर्जरत्रा लोक संस्कृति का संपूर्ण इतिहास प्रतीकिकृत है। श्री देवनारायण फढ़ै के प्रत्येक प्रतीक का तात्पर्य उसके सांस्कृतिक मूल और संदर्भ पर निर्भर होता है। प्रत्येक प्रतीक को समझने के लिए संदर्भ की जरूरत होती है, जिसमें उसका प्रयोग किया जाता है।


खंड- खंड अखंड भारत वर्ष के स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात के भारत में 22 भाषाएं विभिन्न रूप भेद, अंचलिक बोलियों में लोक साहित्य उपलब्ध हैं। जिसका उल्लेख वार्ताकारों, कथा वाचको, द्वारा कहीं गई पौराणिक, ऐतिहासिक तथा लोक कथाएं है जिनके प्रतीकात्मक कथ्य का अर्थ भी संदर्भ में मुखर होता है। काव्य की तरह लोककथा भी सांस्कृतिक तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं, लोकवार्ता, लोक साहित्य का गतिशील रूपक है। एक दूसरे से संवाद, बिंदु दर बिंदु, प्रश्न प्रति प्रश्न,,, का सृजन,,, पुनर्रचना,, अभिप्राय (मोटिव) कहानियां दिल बहलाने के लिए बनी है, इनकी खूबसूरती का आनंद लिया जाना चाहिए (चिड़िया इसलिए नहीं गाती कि उसके पास जवाब है, वह इसलिए गाती है, क्योंकि उनके पास एक गीत है) लोक साहित्य का विस्तृत कार्यक्षेत्र है। लोक साहित्य सांकेतिक भाषा के रूप में बच्चों, परिवारों और समुदायों में समाया हुआ है। जहां भी लोग रहते हैं वहां लोक साहित्य फलता फूलता है। लोक साहित्य मुंह -दर मुंह औरों तक पहुंचता है। शाब्दिक लोक साहित्य (व्यापक मौखिक परंपरा के विशिष्ट रूपों के अर्थ में जैसे कहावतें, पहेलियां, कथाएं, आख्यान, विवरणात्मक गद्य, लोक गीत आदि लोक साहित्य के अंग हैं। शब्दातित पद्धतियों के अंतर्गत (नृत्य, खेल, अल्पनाएं, खिलौने , शिल्प तथा प्रदर्शनात्मक खेल, मदारी, कठपुतली, लोक नाटक, गद्य पद्य गीत, नृत्य, वेशभूषा, व्यंजनात्मक लोक रूप, गांव, शहर और कस्बे का लोकजीवन, व्यापार का प्रत्येक पहलू, सामाजिक जीवन के रीति रिवाज, साहित्यिक आख्यान, नाटक, कला, अर्थ और धर्म सभी लोक जीवन व्यापार में संमाहित है। व्यक्ति का स्वभाव, सौंदर्य बोध और विश्व दृष्टिकोण बचपन में आकार ग्रहण करने लगते हैं और जीवन में दर्ज़ होते जाते हैं यही सब कुछ शाब्दिक और शब्दातित परंपराएं गढ़ती है।


लोक संस्कृति के अध्ययन के लिए कहा जा सकता है की “उसे लोक जीवन के उजाले” में ढूंढो-कहा जा सकता है कि अब हम भीतर प्रवेश कर रहे हैं, घर गृहस्ती की व्यंजनात्मक संस्कृति के भीतर, अपनी चाबियों की तलाश में जैसा कि अक्सर होता है, ऐसा हो सकता है कि लोक जीवन में हमें वांछित चाबियां ना मिले और वह हमें नई बनवा नी पड़े, पर वहां हमें अन्य दूसरी चीजें मिलेगी, जिनके बारे में हमें मालूम ही नहीं कि वह खो चुकी है या वे कभी हमारे पास थी भी,,, बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा का अध्ययन एवं श्री देवनारायण फढ़ै लोकवार्ता के सांगोपांग अध्ययन में मुझे स्वयं को यह तत्व दृष्टिगोचर हुआ है।


अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में कई भारत हैं (अंतरंग अखंड भारत लोक जीवन दर्शन की दृष्टि से 100 से अधिक भाषाएं, 10 लिपि परिवार, अनगिनत संप्रदाय धर्म पंथ, संप्रदायों का जातीय सम्मिश्रण, लोकजीवन परंपरा प्रति- परंपरा, स्वतंत्र भारत वर्ष में 1961 में हुई जनगणना में 1652 मातृ भाषाओं को बोलने वाले मानव समूहों का ज्ञान प्राप्त हुआ, 105 बोलियां जो मूलतः 4 भाषा परिवारों से संबंधित है।
लोकजीवन एवं तत्व विज्ञान की दृष्टि से भाव और विचार भी पदार्थ हैं। भौतिक और अभौतिक वस्तुएं, स्थूल और सूक्ष्म के अंतरंग है। यह सब एक दूसरे में रूपांतरित होते रहते हैं, मानवीय इच्छाएं और आवेश भिन्न रूप धारण करते रहते हैं, एक प्रश्न यथार्थ तीसरी दुनिया का अंश नए विषय वस्तु बल्कि एक दूसरी दुनिया जो भी विषय और वस्तु के निर्माण पर निर्भर करती है, निरंतर है और बनती -बिगड़ती रहती है। यही सब कुछ मिल कर संस्कृति को गढ़ते हैं। सांस्कृतिक तत्व लोक जीवन में व्यक्तियों के चरित्र और चेतना को गढ़ते हैं। यह सब कुछ अखंड भारतीय उपमहाद्वीप के लोकजीवन की बृहत्त सामाजिक प्रक्रिया का अंग है।


अखंड भारत उपमहाद्वीप के वर्तमान स्वतंत्र भारत में 1961 में हुई जनगणना के अनुसार बोली जाने वाली 105 भाषाओं में से 15% भाषाएं 95% आबादी द्वारा लिखी पड़ी और बोली जाती है और उनमें से प्रत्येक भाषा के बोलने वाले लाखों करोड़ों की संख्या में है। इन 15 भाषाओं में कुछ का साहित्य बहुत प्राचीन है ,जिनमें गुर्जरी भाषा का भी समावेश है। तमिल भाषा का साहित्य 2000 वर्ष, बंगाली, सोलह सौ से अधिक बोलिया जिन्हें 105 भाषाओं में वर्गीकृत किया गया है, इन बोलियों का लोक साहित्य पहेलियां ,कहावते, लोकगीतों ,वीर गाथाएं ,आख्यान, लोक साहित्य रुपको का विपुल भंडार अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में विद्यमान है। गुजराती और कुछ अन्य भाषाओं का साहित्य 8000 साल पुराना उपलब्ध है।


भारतीय संस्कृति का आधार लिखित और पवित्र ग्रंथ नहीं समस्त मौखिक परंपराओं द्वारा विकसित वांग्मय है। और संस्कृति की व्यंजना अपने आप में निरंतर सक्रिय संवाद, अतीत और वर्तमान, शाब्दिक और शब्दातीत सब एक दूसरे को पुनर्स्थापित और रूपांतरित करते है। संस्कृत, पाली, प्राकृत और गुर्जरी अपभ्रंश का विस्तार अखंड भारतीय उपमहाद्वीप में है। इनका उद्गम आंचलिक है। भारतीय सभी दर्शन आंतरिक लोकजीवन से परिपोषित है।
गुर्जर लोग जीवन में प्रचलित बगड़ावत श्री देवनारायण महागाथा लोकवार्ता ,राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपना विशेष प्रभाव रखती है। यह गाथा मध्यकाल में गुर्जर राज्य वंश द्वारा परस्पर लड़े गए युद्ध के माध्यम से गुर्जर लोक जीवन को रेखांकित करती हैं। चौहान वंश के बगड़ावत एवं गुर्जर प्रतिहारो के परस्पर युद्ध में सभी बगड़ावत बंधुओं द्वारा वीरगति प्राप्त करने के पश्चात सवाई भोज पत्नी साडू को दिए वचनों के अनुसार श्री देवनारायण कमल पुष्प में अवतार धारण करते हैं।


सवाई भोज पत्नी साडू माता श्री देवनारायण का लालन पालन करती है। श्री देवनारायण अपने ननिहाल मालवा उज्जैन देवास से पुनः गढ़ गोठा पहुंच कर अपने पूर्वजों की संपदा को प्राप्त करने तथा पूर्वजों का बैर लेने के लिए अपने सभी बिछड़े हुए बंधुओं को एकत्रित करते हैं। यह प्रतीकात्मक कथन अखंड भारत उपमहाद्वीप में वर्तमान समय में विभिन्न संप्रदाय धर्मों एवं उपजाति नाम से विद्यमान गुर्जरों को संगठित करने का संदेश अखंड भारत गुर्जरत्रा लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है।


सवाई भोज पत्नी साडू माता अपने कुल शत्रुओं के भय से श्री देवनारायण एवं अपने पशुधन को लेकर गढ़ गोंठा से मालवा देवास (उज्जैन )अपने पीहर अपने भाई दुदा खटाना के यहां चली जाती है। श्री देवनारायण मालवा में अपनी लीलाएं करते हैं ,जिसका गाथा में रोचक वर्णन है। देवनारायण मालवा में छोटे से बड़े होते हैं। बच्चों के साथ में खेले ही खेल में राण और गढ़ गोठा का निर्माण करके राण को विजय करते हैं तथा गढ़ गोठा का राज्य पुनः प्राप्त करते हैं। साडू माता श्री देवनारायण को उनके पूर्वजों के सत्य से अन्भिज्ञ रखती है। श्री देवनारायण मालवा में अपने नाना जी की गायों को चराते हैं और बाल लीलाओं में अपने चमत्कार प्रदर्शित करते हैं जिससे लोग उन्हें देव विभूति के रूप में स्वीकार करने लगते हैं। जब छोछू भाट मालवा पहुंचता है तब साडू माता शंका करती है कि कहीं भाट देवनारायण को उनके पूर्वजों के बैर की स्मृति नहीं करवा देवे, साडू माता खाने में विष मिलाकर छोटू भाट को मारने का प्रयास करती है श्री देवनारायण माता के अंतर्मन की जानते हैं इसलिए वह स्वयं उस विष मिले हुए भोजन को स्वयं खा लेते हैं जो छोटू भाट के लिए तैयार किया गया था। साडू माता भयभीत होती है, श्री देवनारायण अपने मुंह में संपूर्ण विराट सृष्टि का दर्शन करवा कर साडू माता को आश्वस्त करते हैं।


उज्जैन के सिद्धवट पर 52 भैरव 64 जोगणिया से युद्ध करके अपने कुल भाट छोछू को पुनर्जीवित करते हैं, जिसका जोगणियों ने भक्षण कर लिया था।


धार नगरी के राजा की राजकुमारी पीपल दे के कोढ़ का निवारण करके उसके साथ विवाह रचाते हैं। राजकुमारी पीपल दे पूर्व जन्म में जयमति रही है वह नेतू नेकाढ़ण के श्राप वश धार के राजा की अंधी, पंगु और कोड़ी पुत्री के रूप में जन्म लेती है। श्री देवनारायण मालवा में अचल देवी के मान का भी भंग करते हैं और अपनी पूजा प्रारंभ करवाते हैं। अपने ननिहाल से गढ़ गोठा वापस आते समय अपनी मामियों के आग्रह को स्वीकार करते हुए, कुल भाट छोछुं से अपनी तस्वीर चतरा छिपा से बनवाने की कहते हैं। छोछुं भाट चतरा छिपा से श्री देवनारायण पड़ का निर्माण करवाते हैं जिसमें ब्रह्मांड सृष्टि रचना से लेकर सभी अवतार, महाभारत, रामायण, वेद ,पुराण ,उपनिषद एवं अखंड भारतीय उपमहाद्वीप की संपूर्ण संस्कृति प्रतीकिकृत है। बगड़ावत भारत लोकवार्ता रूप वर्तमान में लोक समाज श्री देवनारायण फड़ की कथा भागवत स्वरूप पूजा अर्चना और स्मरण करता है।

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श्री मोहन लाल वर्मा


मोहनलाल वर्मा
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
गुर्जर इतिहास भाषा साहित्य शोध संस्थान पंजीकृत कार्यालय सीकर राजस्थान।
9782655549

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