राजस्थान शिक्षा विभाग समाचार 2023

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पर्वत पुरुष | श्री दशरथ मांझी ने बदले है पहाड़ो के रास्ते

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पर्वत पुरुष | श्री दशरथ मांझी ने बदले है पहाड़ो के रास्ते

Dashrath Manjhi (born 14 January 1929, died 17 August 2007), also known as the “Mountain Man”, was a poor laborer from Gahlaur village near Gaya in Bihar. Carrying only a hammer and chisel, he single-handedly worked 360 Foot long, 30 feet wide and 25 feet high mountain was cut and made a Road After 22 years of hard work, the road built by Dashrath reduced the distance between Atari and Wazirganj blocks from 55 km to 15 km.

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श्री दशरथ मांझी ने बदले है पहाड़ो के रास्ते

दशरथ मांझी (जन्म 14 जनवरी 1929, मृत्यु 17 अगस्त 2007), जिन्हें “माउंटेन मैन” के नाम से भी जाना जाता है, बिहार में गया के पास गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर थे। केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर, उन्होंने अकेले ही काम किया, 360 फुट लंबा, 30 फुट चौड़ा और 25 फुट ऊंचा पहाड़ काटकर सड़क बनाई, 22 साल की मेहनत के बाद, दशरथ द्वारा बनाई गई सड़क ने अटारी और वजीरगंज ब्लॉक के बीच की दूरी को कम कर दिया।

अमर और असीम प्रेम का आधुनिक नाम है दशरथ मांझी। इस कहानी को समाज के सामने लाने का श्रेय श्री ओंकार गिरी गोस्वामी को जाता है। श्री गोस्वामी की नजर समाज के हर मामले पर अपनी टिप्पणी रखती है । हम उनकी दृष्टि के क़ायल रहते है।

दशरथ मांझी | एक पुरुष जिसके दम से बदली है कायनात

अभावग्रस्त जीवन में भी जिजीविषा लिए एक मजदूर जिसने धनबाद में कोयले की खान में काम किया और जिसमें घर से भागकर विवाह कर प्रेम की एक मिसाल कायम की। जब हम पढ़ते सुनते हैं तो मेहनत, धैर्य और प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतीक आधुनिक नाम दशरथ मांझी हमारे जहन में आता है।

यही शख्स जब फागुनी से विवाह करता है तो उसे अत्यंत प्रेम करने का वादा करता है। दोनों मेहनत कश जीवन में विश्वास करते हैं। अपने गांव गहलौर में रहकर गहलौर पर्वत के उस पार लकड़ियां काटने के लिए जाना दशरथ मांझी का दैनिक कार्य था और पति के लिए खाना लेकर जाना फागुनी का।

प्रतिदिन की भांति फागुनी आज भी पति के लिए बड़े चाव से भोजन बनाकर उस पर्वत पर जा रही थी कि अचानक पत्थर से पैर फिसल जाने से वह गिर जाती है और गंभीर रूप से घायल हो जाती है। नजदीकी अस्पताल वजीरगंज में पड़ता था जो कि यहाँ से सड़क मार्ग से 55 किलोमीटर दूर था। दशरथ मांझी ने खूब कोशिश की कि वह उसे शीघ्र ही अस्पताल ले जाए। लेकिन चोट की अधिकता के कारण व समय पर डॉक्टर के पास न ले जा पाने के कारण फागुनी ने रास्ते में ही दम तोड़ लिया।

अपने प्रियतम को इस तरह अपनी जिंदगी से जुदा होता देख वह गहलौर पर्वत से ही रास्ता निकालने की कठोर प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि इस पर्वत से होकर रास्ता निकलने से अस्पताल मात्र 3 किलोमीटर तक रह जाता है। जिससे अस्वस्थ व्यक्ति को बहुत कम समय में वहां पहुंचा सकते है।

दशरथ मांझी ने उस काम को अंजाम देने में लग जाता है तो गांव वाले व सभी उसे सनकी, पागल कह कर पुकारते हैं। कोई उसका साथ नहीं देता है और ना ही उसका हौसला आफजाई करता है। फिर भी विषम परिस्थितियों में धुन का पक्का मांझी न रुका। न आज की तरह मशीनरी थी ना ही कोई सहायक। अकेला होकर भी हिम्मत न हारी। छैनी और हथौड़ी की सहायता से भूखे- प्यासे रहकर भी लगभग 22 साल तक इस पहाड़ को तोड़ने में अपना सब कुछ खपा दिया। आसपास सभी की उपेक्षा का शिकार होने पर भी उसने अपने प्रेम रूपी ताजमहल को तैयार करने में बेपरवाह जीना सीखा। धुन के पक्के इस माउंटेन मैंने ने इस पहाड़ से 360 फीट लंबा 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा रास्ता तैयार किया तो हर कोई हक्का-बक्का रह गया। दशरथ मांझी की जिद व फागुनी के अमिट प्यार का प्रतीक यह रास्ता अब आम जन को समर्पित था। पहाड़ से ऊंचा आदमी दशरथ मांझी नाम से 2012 में इन पर डॉक्यूमेंट्री भी बनी है।

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ओंकार गिरि गोस्वामी
वरिष्ठ अध्यापक हिंदी
रा उ मां वि खींया जैसलमेर

✍️ ओंकार गिरि गोस्वामी
वरिष्ठ अध्यापक, राउमावि खींया, जैसलमेर।

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